पापा 

आज भी घर के दरवाजे की हल्की सी आहट पर ,
लगता है आप आए हो ,
हाथ में पकडे उस लिफ़ाफ़े में शायद ,
चॉकलेट लाये हो। 
बजती है घण्टी तो कोई और सामने खड़ा होता है। 
भरे हुए लिफ़ाफ़े में भी कुछ और निकलता है। 
10 रूपए की वो चॉकलेट भी कमाल कर जाती थी ,
सारे दिन का इंतज़ार ख़त्म कर जाती थी। 
आज हज़ारों का so called डिनर भी फीका सा लगता है। 
आपके साथ का स्वाद रह जाता है ,
नाराज ना होना अगर रो दूँ कभी ,
जानती हूँ मेरे एक आँसू पे  आपकी जान निकल जाती है। 
                ज्योति 

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