Poetry writing

                                                  उलझा सा 

बहुत उलझा सा रहने लगा हूँ  मैं ,
अपने ही खयालो में खोने सा लगा हूँ  मैं ,
कभी बहुत बंदिशे  सी  लगती  हैं  रास्ते  में ,
तो कभी बेफिक्रा  सा घूमता  हूँ मैं ,
बस आजकल उलझा सा रहने लगा हूँ मैं 

कभी बहुत अकेलापन सा महसूस करता  हूँ ,
तो कभी सारे जहाँ  की खुशियां पा  लेता हूँ मैं ,
शायद  तुम्हें  बताया  है मैंने ,
बहुत  उलझा  सा रहने लगा हूँ मैं ,

कभी इस  दुनिया के शोर में झूमता हूँ मैं 
तो कभी मेरे अंदर की खमोशी से रोता  हूँ मैं 
अपने ही  सवालों  में ,
बहुत उलझा सा रहने लगा हूँ मैं ,

कभी बहुत अलग सा पाता हूँ मैं खुद को 
तो कभी इस भीड़ में खो जाता हूँ मैं ,
हाँ   यह सच है ,
आजकल बहुत उलझा सा रहने लगा हूँ मैं 
                                                                                                             भावना 

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