वो  

आज फिर ढल चली है शाम ,
फिर चल दिए परिंदे घर ,
फिर डूब रहा है सूरज ,
मैंने भी सीख लिया है जीना ,
कुछ अटपटी सी आदतों के साथ। 

शामें तो बहुत देखी हैं ढलती ,
मगर तुम मानोगे नहीं ,
आज अलग सा सुकून था उसमे ,
क्योंकि आज वो था मेरे साथ ,
मेरा हाथ थामकर बैठा था मेरे साथ। 
  भावना 

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